Friday, June 1, 2012

जबतक ------

जबतक आसक्ति है , तबतक कामना रहेगी
जबतक कामना है , तबतक क्रोध रहेगा
जबतक विचार हैं , तबतक होश बन नहीं सकता
जबतक विचार उठानें की ऊर्जा है , तबतक खोज रहेगी
जब विचार निर्विचार में बदल जाते हैं तब खोज भी समाप्त हो जाती है
प्रभु की खुशबूं लेनी है तो भोग तत्त्वों का द्रष्टा बनो
यह सब मैं नहीं प्रभु श्री कृष्ण गीता में कह रहे हैं
जो -----
एक सांख्य - योगी हैं और अर्जुन के रथ के चालक
अर्जुन से कृष्ण तक की यात्रा का नाम है गीता
==== ओम् ======

Monday, May 21, 2012

क्यों परेशान से दिखते हो ?

कल जो हुआ उस बात को आज क्यों ढो रहे हो , आज का दिन नया दिन है , आज तुम वह नहीं जो कल थे और आज वह भी वह नहीं जो कल था फिर कल की स्मृति में आज को क्यों ब्यर्थ में गवा रहे  हो ?
जीवन को बहनें दो उसे घसीटो नहीं , वह तो प्रभु का प्रसाद है , उसे प्यार से स्वीकारो /
आना - जाना , सुख - दुःख , नरम - गरम , लगाव - विलगाव यह द्वैत्य का आलम तो ऐसा ही रहेगा लेकिन तुम इसके परे पहुँच  कर उसे जरुर देख सकता है जो इन सब का श्रोत है /
==== ओम् =======

Sunday, March 4, 2012

गीता में प्रभू कहते हैं



  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा सत् को पहचानता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा प्रकृति - पुरुष का ज्ञानी होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , तत्त्व – वित् द्रष्टा होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा ही योगी , संन्यासी एवं स्थिर प्रज्ञ होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , मैं किसी के कर्म एवं कर्म फल की रचना नहीं करता

  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा द्वैत्य में नहीं रहता

  • गीता में प्रभू कहते हैं , मैं नहीं कर्म की प्रेणना गुण देते हैं

  • गीता में प्रभू कहते है , कर्म का फल सुख – दुःख की जननी नहीं है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , जो कर्म फल की उम्मीद रखते हैं उनको सुख – दुःख से गुजरना होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसज्ज्ञित :

===== ओम् =======



गीता में प्रभू कहते हैं


  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा सत् को पहचानता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा प्रकृति - पुरुष का ज्ञानी होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , तत्त्व – वित् द्रष्टा होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा ही योगी , संन्यासी एवं स्थिर प्रज्ञ होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , मैं किसी के कर्म एवं कर्म फल की रचना नहीं करता

  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा द्वैत्य में नहीं रहता

  • गीता में प्रभू कहते हैं , मैं नहीं कर्म की प्रेणना गुण देते हैं

  • गीता में प्रभू कहते है , कर्म का फल सुख – दुःख की जननी नहीं है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , जो कर्म फल की उम्मीद रखते हैं उनको सुख – दुःख से गुजरना होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसज्ज्ञित :


===== ओम्=======