Monday, May 21, 2012

क्यों परेशान से दिखते हो ?

कल जो हुआ उस बात को आज क्यों ढो रहे हो , आज का दिन नया दिन है , आज तुम वह नहीं जो कल थे और आज वह भी वह नहीं जो कल था फिर कल की स्मृति में आज को क्यों ब्यर्थ में गवा रहे  हो ?
जीवन को बहनें दो उसे घसीटो नहीं , वह तो प्रभु का प्रसाद है , उसे प्यार से स्वीकारो /
आना - जाना , सुख - दुःख , नरम - गरम , लगाव - विलगाव यह द्वैत्य का आलम तो ऐसा ही रहेगा लेकिन तुम इसके परे पहुँच  कर उसे जरुर देख सकता है जो इन सब का श्रोत है /
==== ओम् =======

Sunday, March 4, 2012

गीता में प्रभू कहते हैं



  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा सत् को पहचानता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा प्रकृति - पुरुष का ज्ञानी होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , तत्त्व – वित् द्रष्टा होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा ही योगी , संन्यासी एवं स्थिर प्रज्ञ होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , मैं किसी के कर्म एवं कर्म फल की रचना नहीं करता

  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा द्वैत्य में नहीं रहता

  • गीता में प्रभू कहते हैं , मैं नहीं कर्म की प्रेणना गुण देते हैं

  • गीता में प्रभू कहते है , कर्म का फल सुख – दुःख की जननी नहीं है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , जो कर्म फल की उम्मीद रखते हैं उनको सुख – दुःख से गुजरना होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसज्ज्ञित :

===== ओम् =======



गीता में प्रभू कहते हैं


  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा सत् को पहचानता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा प्रकृति - पुरुष का ज्ञानी होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , तत्त्व – वित् द्रष्टा होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा ही योगी , संन्यासी एवं स्थिर प्रज्ञ होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , मैं किसी के कर्म एवं कर्म फल की रचना नहीं करता

  • गीता में प्रभू कहते हैं , द्रष्टा द्वैत्य में नहीं रहता

  • गीता में प्रभू कहते हैं , मैं नहीं कर्म की प्रेणना गुण देते हैं

  • गीता में प्रभू कहते है , कर्म का फल सुख – दुःख की जननी नहीं है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , जो कर्म फल की उम्मीद रखते हैं उनको सुख – दुःख से गुजरना होता है

  • गीता में प्रभू कहते हैं , भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसज्ज्ञित :


===== ओम्=======